मातंगी महाविद्या साधना एवं कवच


साधना विधि यह साधना मातंगी जयन्ती, मातंगी सिद्धि दिवस अथवा किसी भी सोमवार के दिन से शुरू की जा सकती है। यह साधना रात्रिकालीन है और इसे रात्रि में ९



श्री कलिकाष्टकम्


श्री कलिकाष्टकम् ध्यान गलद्रक्त मुंडावली कंठमाला , महाघोररावा सुन्दष्ट्रा कराला | विवस्त्रा श्मशानालया मुक्तकेशी , महाकालकामाकुला कालिकेयम् || भुजे वामयुग्मे शिरोसि दधाना, वरं दक्षयुग्मेभयं वै तथैव | सुमध्यापि तुन्ग्स्तना भारनम्रा,



अपराजिता देवी दुर्गा स्तोत्र, शत्रु मारण


अपराजिता श्री दुर्गादेवीका मारक रूप है । अपराजिता देवी का पूजन पूजास्थलपर अष्टदलकी आकृति बनाते हैं । इस अष्टदलका मध्यबिंदु `भूगर्भबिंदु’ अर्थात देवीके `अपराजिता’ रूपकी उत्पत्तिबिंदु का प्रतीक है, तथा



मंत्र सिद्धि के लिए हवन के नियम और विधि


मंत्र सिद्ध करने के बाद हवन अत्यंत ही महत्वपूर्ण क्रिया मानी जाती है। हवन का अर्थ होता है कि, अग्नि के द्वारा किसी भी पदार्थ की आहुति प्रदान करना अथवा



खून की उल्टी करके मरेंगे सभी शत्रु, करें ये मारण प्रयोग


प्रत्यक्ष शत्रु से निपटना आसान होता है किन्तु हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु होते हैं जो सामने मित्रता पूर्ण व्यवहार रखते हैं किन्तु हमारे पीठ पीछे हमे नुकसान पहुंचाते हैं व



साधना करते समय साधक के अनुभव


साधना करने के दौरान प्रत्येक साधक को होने वाले अनुभव शारीरिक दर्द, विशेष रूप से गर्दन, कंधे और पीठ में। यह आपके आध्यात्मिक डीएनए स्तर पर गहन परिवर्तन का परिणाम




शिव ताण्डव स्तोत्र


 शिवताण्डवस्तोत्रम् जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि । धगद्धगद्धगज्जलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु



सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र


  श्री गणेशाय नमः ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्, मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । शिव उवाच श्रुणु



पाशुपतास्त्र स्तोत्र


ॐ नमो भगवते महापाशुपतायातुलबलवीर्यपराक्रमाय त्रिपन्चनयनाय नानारुपाय नानाप्रहरणोद्यताय सर्वांगडरक्ताय भिन्नांजनचयप्रख्याय श्मशान वेतालप्रियाय सर्वविघ्ननिकृन्तन रताय सर्वसिद्धिप्रदाय भक्तानुकम्पिने असंख्यवक्त्रभुजपादाय तस्मिन् सिद्धाय वेतालवित्रासिने शाकिनीक्षोभ जनकाय व्याधिनिग्रहकारिणे पापभन्जनाय सूर्यसोमाग्नित्राय विष्णु कवचाय खडगवज्रहस्ताय यमदण्डवरुणपाशाय रूद्रशूलाय ज्वलज्जिह्राय