श्री महाविपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्रम, शत्रु मारण



मां प्रत्यंगिरा का भद्रकाली या महाकाली का ही विराट रूप है। मां प्रत्यंगिरा की गुप्तरूप से की गई आराधना, जप से अच्छों अच्छों के झक्के छूट जाते हैं। कितना ही बड़ा काम क्यों न हो अथवा कितना बड़ा शत्रु ही क्यों न हो, सभी का मां चुटकियों में शमन कर देती हैं।
प्रत्यक्ष शत्रु से निपटना आसान होता है किन्तु हमारे कई अप्रत्यक्ष शत्रु होते हैं जो सामने मित्रता पूर्ण व्यवहार रखते हैं किन्तु हमारे पीठ पीछे हमे नुकसान पहुंचाते हैं व हमारी छवि बिगाड़ते रहते हैं, और हमारे परिवार के सदस्यो पर अपनी शत्रुता निकालते हैं। ऐंसे शत्रुओं पर यह मारण प्रयोग करने पर सिर्फ शत्रु ही नहीं बल्कि उसके परिवार के सदस्य पर भी प्रभाव होता है। शत्रु को हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज, कैंसर, क्षय रोग, लकवा, पागलपन, विक्षिप्त बनाने, आपसी विवाद कराने, वाहन दुर्घटना, सूखी लगाना, धन हानि, व्यापार मे नुकसान पहुंचाकर बदला लेने के लिए इन तांत्रिक प्रयोगो को करें। स्तोत्रम प्रारंभ करने से पूर्व प्रथम पूज्य श्रीगणेश, भगवान शंकर पार्वती, गुरुदेव, मां सरस्वती, गायत्रीदेवी, भगवान सूर्यदेव, इष्टदेव, कुलदेव तथा कुलदेवी का ध्यान अवश्य कर लें। यह स्तोत्र रात्रि 10 बजे से 2 के मध्य किया जाए तो तत्काल फल देता है।

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चेतावनी: यह प्रयोग केवल educational purpose से दिया गया है, कृपया स्वयं इसका प्रयोग न करें एवं योग्य गुरु के मार्गदर्शन मे ही करें। किसी मासूम निर्दोष व्यक्ति पर प्रयोग न करें। तंत्र क्रिया परमाणु बम के जैंसी होती है सही विधि से प्रयोग न की जाये तो radiation से आपका विनाश कर सकती है।

श्री महाविपरीतप्रत्यंगिरा स्तोत्रम

नमस्कार मन्त्रः श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा काल्यै नमः।

पूर्व पीठिका महेश्वर उवाच

श्रृणु देवि, महा विद्यां, सर्व सिद्धि प्रदायिकां। यस्याः विज्ञान मात्रेण, शत्रु वर्गाः लयं गताः।।
विपरीता महा काली, सर्व भूत भयंकरी। यस्याः प्रसंग मात्रेण, कम्पते च जगत् त्रयम्।।
न च शान्ति प्रदः कोऽपि, परमेशो न चैव हि। देवताः प्रलयं यान्ति, किं पुनर्मानवादयः।।
पठनाद्धारणाद्देवि, सृष्टि संहारको भवेत्। अभिचारादिकाः सर्वेया या साध्य तमाः क्रियाः।।
स्मरेणन महा काल्याः, नाशं जग्मुः सुरेश्वरि, सिद्धि विद्या महा काली, परत्रेह च मोदते।।
सप्त लक्ष महा विद्याः, गोपिताः परमेश्वरि, महा काली महा देवी, शंकरस्येष्ट देवता।।
यस्याः प्रसाद मात्रेण, पर ब्रह्म महेश्वरः। कृत्रिमादि विषघ्ना सा, प्रलयाग्नि निवर्तिका।।
त्वद् भक्त दशंनाद् देवि, कम्पमानो महेश्वरः। यस्य निग्रह मात्रेण, पृथिवी प्रलयं गता।।
दश विद्याः सदा ज्ञाता, दश द्वार समाश्रिताः। प्राची द्वारे भुवनेशी, दक्षिणे कालिका तथा।।
नाक्षत्री पश्चिमे द्वारे, उत्तरे भैरवी तथा। ऐशान्यां सततं देवि, प्रचण्ड चण्डिका तथा।।
आग्नेय्यां बगला देवी, रक्षः कोणे मतंगिनी, धूमावती च वायव्वे, अध ऊर्ध्वे च सुन्दरी।।
सम्मुखे षोडशी देवी, सदा जाग्रत् स्वरुपिणी। वाम भागे च देवेशि, महा त्रिपुर सुन्दरी।।
अंश रुपेण देवेशि, सर्वाः देव्यः प्रतिष्ठिताः। महा प्रत्यंगिरा सैव, विपरीता तथोदिता।।
महा विष्णुर्यथा ज्ञातो, भुवनानां महेश्वरि। कर्ता पाता च संहर्ता, सत्यं सत्यं वदामि ते।।
भुक्ति मुक्ति प्रदा देवी, महा काली सुनिश्चिता। वेद शास्त्र प्रगुप्ता सा, न दृश्या देवतैरपि।।
अनन्त कोटि सूर्याभा, सर्व शत्रु भयंकरी। ध्यान ज्ञान विहीना सा, वेदान्तामृत वर्षिणी।।
सर्व मन्त्र मयी काली, निगमागम कारिणी। निगमागम कारी सा, महा प्रलय कारिणी।।‍
यस्या अंग घर्म लवा, सा गंगा परमोदिता। महा काली नगेन्द्रस्था, विपरीता महोदयाः।।
यत्र यत्र प्रत्यंगिरा, तत्र काली प्रतिष्ठिता। सदा स्मरण मात्रेण, शत्रूणां निगमागमाः।।
नाशं जग्मुः नाशमायुः सत्यं सत्यं वदामि ते। पर ब्रह्म महा देवि, पूजनैरीश्वरो भवेत्।।
शिव कोटि समो योगी, विष्णु कोटि समः स्थिरः। सर्वैराराधिता सा वै, भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी।।
गुरु मन्त्र शतं जप्त्वा, श्वेत सर्षपमानयेत्। दश दिशो विकिरेत् तान्, सर्व शत्रु क्षयाप्तये।।
भक्त रक्षां शत्रु नाशं, सा करोति च तत्क्षणात्। ततस्तु पाठ मात्रेण, शत्रुणां मारणं भवेत्।।

गुरु मन्त्रः
ॐ हूं स्फारय स्फारय, मारय मारय, शत्रु वर्गान् नाशय नाशय स्वाहा   [100 बार करना है 108 बार नहीं ]

विनियोगः
ॐ अस्य श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्र माला मन्त्रस्य श्रीमहा काल भैरव ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा देवता, हूं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा प्रसादात् सर्वत्र सर्वदा सर्व विध रक्षा पूर्वक सर्व शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त फल प्राप्त्यर्थे वा पाठे विनियोगः।

ऋष्यादि न्यासः
शिरसि श्रीमहा काल भैरव ऋषये नमः। मुखे त्रिष्टुप् छन्दसे नमः। हृदि श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा देवतायै नमः। गुह्ये हूं बीजाय नमः। पादयोः ह्रीं शक्तये नमः। नाभौ क्लीं कीलकाय नमः। सर्वांगे मम श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा प्रसादात् सर्वत्र सर्वदा सर्व विध रक्षा पूर्वक सर्व शत्रूणां नाशार्थे यथोक्त फल प्राप्त्यर्थे वा पाठे विनियोगाय नमः।

कर न्यासः
हूं ह्रीं क्लीं ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ तर्जनीभ्यां नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ मध्यमाभ्यां नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ अनामिकाभ्यां नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ कनिष्ठिकाभ्यां नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ कर तल द्वयोर्नमः।

हृदयादि न्यासः
हूं ह्रीं क्लीं ॐ हृदयाय नमः। हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिरसे स्वाहा। हूं ह्रीं क्लीं ॐ शिखायै वषट्। हूं ह्रीं क्लीं ॐ कवचाय हुम्। हूं ह्रीं क्लीं ॐ नेत्र त्रयाय वौषट्। हूं ह्रीं क्लीं ॐ अस्त्राय फट्।

मूल स्तोत्र पाठ
ॐ नमो विपरीत प्रत्यंगिरायै सहस्त्रानेक कार्य लोचनायै कोटि विद्युज्जिह्वायै महा व्याव्यापिन्यै संहार रुपायै जन्म शान्ति कारिण्यै। मम स परिवारकस्य भावि भूत भवच्छत्रून् स दाराऽपत्यान् संहारय संहारय, महा प्रभावं दर्शय दर्शय, हिलि हिलि, किलि किलि, मिलि मिलि, चिलि चिलि, भूरि भूरि, विद्युज्जिह्वे, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, ध्वंसय ध्वंसय, प्रध्वंसय प्रध्वंसय, ग्रासय ग्रासय, पिब पिब, नाशय नाशय, त्रासय त्रासय, वित्रासय वित्रासय, मारय मारय, विमारय विमारय, भ्रामय भ्रामय, विभ्रामय विभ्रामय, द्रावय द्रावय, विद्रावय विद्रावय हूं हूं फट् स्वाहा।।२४

हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे, हूं लं ह्रीं लं क्लीं लं ॐ लं फट् फट् स्वाहा। हूं लं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे। मम स परिवारकस्य यावच्छत्रून् देवता पितृ पिशाच नाग गरुड़ किन्नर विद्याधर गन्धर्व यक्ष राक्षस लोक पालान् ग्रह भूत नर लोकान् स मन्त्रान् सौषधान् सायुधान् स सहायान् बाणैः छिन्दि छिन्दि, भिन्धि भिन्धि, निकृन्तय निकृन्तय, छेदय छेदय, उच्चाटय उच्चाटय, मारय मारय, तेषां साहंकारादि धर्मान् कीलय कीलय, घातय घातय, नाशय नाशय, विपरीत प्रत्यंगिरे। स्फ्रें स्फ्रेंत्कारिणि। ॐ ॐ जं जं जं जं जं, ॐ ठः ठः ठः ठः ठः मम स परिवारकस्य शत्रूणां सर्वाः विद्याः स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, हस्तौ स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, मुखं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, नेत्राणि स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, दन्तान् स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, जिह्वां स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, पादौ स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, गुह्यं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, स कुटुम्बानां स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, स्थानं स्तम्भय स्तम्भय, नाशय नाशय, सम्प्राणान् कीलय कीलय, नाशय नाशय, हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ऐं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा। मम स परिवारकस्य सर्वतो रक्षां कुरु कुरु, फट् फट् स्वाहा ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं।।२५

ऐं ह्रूं ह्रीं क्लीं हूं सों विपरीत प्रत्यंगिरे, मम स परिवारकस्य भूत भविष्यच्छत्रूणामुच्चाटनं कुरु कुरु, हूं हूं फट् फट् स्वाहा, ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं वं वं वं वं वं लं लं लं लं लं लं रं रं रं रं रं यं यं यं यं यं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ नमो भगवति, विपरीत प्रत्यंगिरे, दुष्ट चाण्डालिनि, त्रिशूल वज्रांकुश शक्ति शूल धनुः शर पाश धारिणि, शत्रु रुधिर चर्म मेदो मांसास्थि मज्जा शुक्र मेहन् वसा वाक् प्राण मस्तक हेत्वादि भक्षिणि, पर ब्रह्म शिवे, ज्वाला दायिनि, ज्वाला मालिनि, शत्रुच्चाटन मारण क्षोभण स्तम्भन मोहन द्रावण जृम्भण भ्रामण रौद्रण सन्तापन यन्त्र मन्त्र तन्त्रान्तर्याग पुरश्चरण भूत शुद्धि पूजा फल परम निर्वाण हरण कारिणि, कपाल खट्वांग परशु धारिणि। मम स परिवारकस्य भूत भविष्यच्छत्रुन् स सहायान् स वाहनान् हन हन रण रण, दह दह, दम दम, धम धम, पच पच, मथ मथ, लंघय लंघय, खादय खादय, चर्वय चर्वय, व्यथय व्यथय, ज्वरय ज्वरय, मूकान् कुरु कुरु, ज्ञानं हर हर, हूं हूं फट् फट् स्वाहा।।२६

ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे। ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् स्वाहा। मम स परिवारकस्य कृत मन्त्र यन्त्र तन्त्र हवन कृत्यौषध विष चूर्ण शस्त्राद्यभिचार सर्वोपद्रवादिकं येन कृतं, कारितं, कुरुते, करिष्यति, तान् सर्वान् हन हन, स्फारय स्फारय, सर्वतो रक्षां कुरु कुरु, हूं हूं फट् फट् स्वाहा। हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा।।२७

ॐ हूं ह्रीं क्लीं ॐ अं विपरीत प्रत्यंगिरे, मम स परिवारकस्य शत्रवः कुर्वन्ति, करिष्यन्ति, शत्रुस्च, कारयामास, कारयिष्यन्ति, याऽ याऽन्यां कृत्यान् तैः सार्द्ध तांस्तां विपरीतां कुरु कुरु, नाशय नाशय, मारय मारय, श्मशानस्थां कुरु कुरु, कृत्यादिकां क्रियां भावि भूत भवच्छत्रूणां यावत् कृत्यादिकां विपरीतां कुरु कुरु, तान् डाकिनी मुखे हारय हारय, भीषय भीषय, त्रासय त्रासय, मारय मारय, परम शमन रुपेण हन हन, धर्मावच्छिन्न निर्वाणं हर हर, तेषां इष्ट देवानां शासय शासय, क्षोभय क्षोभय, प्राणादि मनो बुद्धयहंकार क्षुत् तृष्णाऽऽकर्षण लयन आवागमन मरणादिकं नाशय नाशय, हूं हूं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं ॐ फट् फट् स्वाहा।२८

क्षं ऴं हं सं षं शं। वं लं रं यं। मं भं बं फं पं। नं धं दं थं तं। णं ढं डं ठं टं। ञं झं जं छं चं। ङं घं गं खं कं। अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं। हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे, हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा। क्षं ऴं हं सं षं शं। वं लं रं यं। मं भं बं फं पं। नं धं दं थं तं। णं ढं डं ठं टं। ञं झं जं छं चं। ङं घं गं खं कं। अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं, हूं हूं हूं हूं हूं हूं हूं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ फट् फट् स्वाहा।।२९

अः अं औं ओं ऐं एं ॡं लृं ॠं ऋं ऊं उं ईं इं आं अं। ङं घं गं खं कं। ञं झं जं छं चं। णं ढं डं ठं टं। नं धं दं थं तं। मं भं बं फं पं। वं लं रं यं। क्षं ऴं हं सं षं शं। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ मम स परिवारकस्य स्थाने मम शत्रूणां कृत्यान् सर्वान् विपरीतान् कुरु कुरु, तेषां मन्त्र यन्त्र तन्त्रार्चन श्मशानारोहण भूमि स्थापन भस्म प्रक्षेपण पुरश्चरण होमाभिषेकादिकान् कृत्यान् दूरी कुरु कुरु, नाशं कुरु कुरु, हूं विपरीत प्रत्यंगिरे। मां स परिवारकं सर्वतः सर्वेभ्यो रक्ष रक्ष हूं ह्रीं फट् स्वाहा।।३०

अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः। कं खं गं घं ङं। चं छं जं झं ञं। टं ठं डं ढं णं। तं थं दं धं नं। पं फं बं भं मं। यं रं लं वं। शं षं सं हं ळं क्षं। ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ हूं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे। हूं ह्रीं क्लीं ॐ फट् स्वाहा। ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं, अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृं ॡं एं ऐं ओं औं अं अः। कं खं गं घं ङं। चं छं जं झं ञं। टं ठं डं ढं णं। तं थं दं धं नं। पं फं बं भं मं। यं रं लं वं। शं षं सं हं ळं क्षं। विपरीत प्रत्यंगिरे। मम स परिवारकस्य शत्रूणां विपरीतादि क्रियां नाशय नाशय, त्रुटिं कुरु कुरु, तेषामिष्ट देवतादि विनाशं कुरु कुरु, सिद्धिं अपनयापनय, विपरीत प्रत्यंगिरे, शत्रु मर्दिनि। भयंकरि। नाना कृत्यादि मर्दिनि, ज्वालिनि, महा घोर तरे, त्रिभुवन भयंकरि शत्रूणां मम स परिवारकस्य चक्षुः श्रोत्रादि पादौं सवतः सर्वेभ्यः सर्वदा रक्षां कुरु कुरु स्वाहा।।३१

श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वसुन्धरे। मम स परिवारकस्य स्थानं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३२
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ महा लक्ष्मि। मम स परिवारकस्य पादौ रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३३
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ चण्डिके। मम स परिवारकस्य जंघे रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३४
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ चामुण्डे। मम स परिवारकस्य गुह्यं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३५
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ इन्द्राणि। मम स परिवारकस्य नाभिं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३६
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ नारसिंहि। मम स परिवारकस्य बाहू रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३७
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वाराहि। मम स परिवारकस्य हृदयं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३८
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ वैष्णवि। मम स परिवारकस्य कण्ठं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।३९
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ कौमारि। मम स परिवारकस्य वक्त्रं रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।४०
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ माहेश्वरि। मम स परिवारकस्य नेत्रे रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।४१
श्रीं ह्रीं ऐं ॐ ब्रह्माणि। मम स परिवारकस्य शिरो रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।४२
हूं ह्रीं क्लीं ॐ विपरीत प्रत्यंगिरे। मम स परिवारकस्य छिद्रं सर्व गात्राणि रक्ष रक्ष हुं फट् स्वाहा।।४३

सन्तापिनी संहारिणी, रौद्री च भ्रामिणी तथा।जृम्भिणी द्राविणी चैव, क्षोभिणि मोहिनी ततः।।
स्तम्भिनी चांडशरुपास्ताः, शत्रु पक्षे नियोजिताः। प्रेरिता साधकेन्द्रेण, दुष्ट शत्रु प्रमर्दिकाः।।

ॐ सन्तापिनि! स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् सन्तापय सन्तापय हूं फट् स्वाहा।।४४
ॐ संहारिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् संहारय संहारय हूं फट् स्वाहा।।४५
ॐ रौद्रि! स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् रौद्रय रौद्रय हूं फट् स्वाहा।।४६
ॐ भ्रामिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् भ्रामय भ्रामय हूं फट् स्वाहा।।४७
ॐ जृम्भिणि! स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् जृम्भय जृम्भय हूं फट् स्वाहा।।४८
ॐ द्राविणि। स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् द्रावय द्रावय हूं फट् स्वाहा।।४९
ॐ क्षोभिणि। स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् क्षोभय क्षोभय हूं फट् स्वाहा।।५०
ॐ मोहिनि। स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् मोहय मोहय हूं फट् स्वाहा।।५१
ॐ स्तम्भिनि। स्फ्रें स्फ्रें मम स परिवारकस्य शत्रुन् स्तम्भय स्तम्भय हूं फट् स्वाहा।।५२

फल श्रुति:
श्रृणोति य इमां विद्यां, श्रृणोति च सदाऽपि ताम्। यावत् कृत्यादि शत्रूणां, तत्क्षणादेव नश्यति।।
मारणं शत्रु वर्गाणां, रक्षणाय चात्म परम्। आयुर्वृद्धिर्यशो वृद्धिस्तेजो वृद्धिस्तथैव च।।
कुबेर इव वित्ताढ्यः, सर्व सौख्यमवाप्नुयात्। वाय्वादीनामुपशमं, विषम ज्वर नाशनम्।।
पर वित्त हरा सा वै, पर प्राण हरा तथा। पर क्षोभादिक करा, तथा सम्पत् करा शुभा।।
स्मृति मात्रेण देवेशि। शत्रु वर्गाः लयं गताः। इदं सत्यमिदं सत्यं, दुर्लभा देवतैरपि।।
शठाय पर शिष्याय, न प्रकाश्या कदाचन। पुत्राय भक्ति युक्ताय, स्व शिष्याय तपस्विने।।
प्रदातव्या महा विद्या, चात्म वर्ग प्रदायतः। विना ध्यानैर्विना जापैर्वना पूजा विधानतः।।
विना षोढा विना ज्ञानैर्मोक्ष सिद्धिः प्रजायते। पर नारी हरा विद्या, पर रुप हरा तथा।।
वायु चन्द्र स्तम्भ करा, मैथुनानन्द संयुता। त्रि सन्ध्यमेक सन्ध्यं वा, यः पठेद्भक्तितः सदा।।
सत्यं वदामि देवेशि। मम कोटि समो भवेत्। क्रोधाद्देव गणाः सर्वे, लयं यास्यन्ति निश्चितम्।।
किं पुनर्मानवा देवि। भूत प्रेतादयो मृताः। विपरीत समा विद्या, न भूता न भविष्यति।।
पठनान्ते पर ब्रह्म विद्यां स भास्करां तथा। मातृकांपुटितं देवि, दशधा प्रजपेत् सुधीः।।
वेदादि पुटिता देवि। मातृकाऽनन्त रुपिणी। तया हि पुटितां विद्यां, प्रजपेत् साधकोत्तमः।।
मनो जित्वा जपेल्लोकं, भोग रोगं तथा यजेत्। दीनतां हीनतां जित्वा, कामिनी निर्वाण पद्धतिम्।।

परब्रह्मविद्या
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ अँ आँ इँ ईँ उँ ऊँ ऋँ ॠँ लृँ ॡँ एँ ऐँ ओँ औँ अँ अः। कँ खँ गँ घँ ङँ। चँ छँ जँ झँ ञँ। टँ ठँ डँ ढँ णँ। तँ थँ दँ धँ नँ। पँ फँ बँ भँ मँ। यँ रँ लँ वँ। शँ षँ सँ हँ ळँ क्षँ। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ विपरीत पर ब्रह्म महा प्रत्यंगिरे ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ, अँ आँ इँ ईँ उँ ऊँ ऋँ ॠँ लृँ ॡँ एँ ऐँ ओँ औँ अँ अः। कँ खँ गँ घँ ङँ। चँ छँ जँ झँ ञँ। टँ ठँ डँ ढँ णँ। तँ थँ दँ धँ नँ। पँ फँ बँ भँ मँ। यँ रँ लँ वँ। शँ षँ सँ हँ ळँ क्षँ। ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ। (१० वारं जपेत्)।।६६ से ७५

प्रार्थना
ॐ विपरीत पर ब्रह्म महा प्रत्यंगिरे। स परिवारकस्य सर्वेभ्यः सर्वतः सर्वदा रक्षां कुरु कुरु, मरण भयमपनयापनय, त्रि जगतां बल रुप वित्तायुर्मे स परिवारकस्य देहि देहि, दापय दापय, साधकत्वं प्रभुत्वं च सततं देहि देहि, विश्व रुपे। धनं पुत्रान् देहि देहि, मां स परिवारकं, मां पश्यन्तु। देहिनः सर्वे हिंसकाः हि प्रलयं यान्तु, मम स परिवारकस्य यावच्छत्रूणां बल बुद्धि हानिं कुरु कुरु, तान् स सहायान् सेष्ट देवान् संहारय संहारय, तेषां मन्त्र यन्त्र तन्त्र लोकान् प्राणान् हर हर, हारय हारय, स्वाभिचारमपनयापनय, ब्रह्मास्त्रादीनि नाशय नाशय, हूं हूं स्फ्रें स्फ्रें ठः ठः ठः फट् फट् स्वाहा।।
।।इति श्रीमहा विपरीत प्रत्यंगिरा स्तोत्रम्।।

विशेष ज्ञातव्यः
शास्त्रों में प्रायः सभी महाविद्याओं और अन्य देवताओं के विपरीत प्रत्यंगिरा मन्त्र स्तोत्र आदि मिलते हैं किन्तु यह स्तोत्र उन सबकी चरम सीमा है। इसकी पूर्व पीठिका और फल श्रुति में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है। केवल करने की सामर्थ्य भर हो। किसी भी प्रकार का अभिचार, रोग, ग्रह पीड़ा, देव पीड़ा, दुर्भाग्य, शत्रु या राज भय आदि क्या है ऐसा, जिसका शमन इससे नहीं हो सकता। इसके साधक को कृत्या देख भी नहीं सकती, अहित कर पाना तो दूर की बात है।
1. पूर्व पीठिका के 23 श्लोकों का पाठ करके, दस दाने सफेद सरसों (इसे ही पीली सरसों भी कहते हैं। अन्य नाम हैं सिद्धार्थ, राई, राजिका आदि।) लेकर गुरु मन्त्र से १०० बार (१०८ बार नहीं) अभिमन्त्रित कर दशों दिशाओं में दस दस दाना फेंक दें। फिर विनियोगादि आगे की क्रिया करके पाठ करें।
आप चाहें तो सरसों के दाने अधिक भी ले सकते हैं, किन्तु सभी दिशाओं में दाने समान संख्या में फेंके।
2. फल श्रुति के अन्त में पर ब्रह्मविद्या का १० बार जप करें। यदि अधिक संख्या में पाठ करें, तो परब्रह्मविद्या का जप केवल प्रथम और अन्तिम पाठ में करें। बीच के पाठों में मात्र स्तोत्र का पाठ होगा।
3. पुरश्चरण आवश्यक नहीं है, किन्तु सर्वोत्तम होगा कि विधि पूर्वक १००० पाठ कर लिए जाएँ। प्रयोग के लिए १०० पाठ पर्याप्त है, यदि आवश्यक हो तो अधिक करें।
4.पुरश्चरण और प्रयोग काल में नित्य शिवा बलि अवश्य दें। कौल साधक तत्त्वों से तथा पाशव कल्प के साधक अनुकल्पों से बलि दें।
तामसिक साधक मछली, मुर्गा, बकरा व सात्विक साधक नींबू, नारियल आदि की बलि दें। मछली मुर्गा बकरा आदि की बलि देने से निर्दोष जीवो की हत्या का पाप लगता है, इसलिए नारियल या नींबू की बलि दें।

[ नोट: सभी तांत्रिक क्रियाएँ व साधनाएं सिर्फ जानकारी के उद्देश्य से दी गई हैं, गुरु के मार्गदर्शन मे ही कोई साधना व तंत्र क्रिया करें अन्यथा आप पर विपरीत प्रभाव भी हो सकता है। किसी के ऊपर दुरुपयोग न करें एवं साधना मे त्रुटि से होने वाले किसी भी क्षति  व हानि के उत्तरदायी आप स्वयं होंगे, mantrashakti.in इसके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं होगा। ]


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