लंकापति रावण उड्डीस तंत्र तांत्रिक मारण मंत्र



रावण एक विद्वान पंडित होने के साथ ही विद्वान तांत्रिक और ज्‍योतिषी भी था। माना जाता है कि सौरमंडल के सभी ग्रह रावण के ही इशारे पर चलते थे। कोई भी ग्रह रावण की इच्‍छा के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकता था। मेघनाद के जन्‍म के समय रावण ने सभी ग्रहों को आदेश दिया था कि वे सभी एक निश्चित स्थिति में बने रहे ताकी उसका पूत्र महान योद्धा और यशस्‍वी हो। सभी ग्रहों ने रावण के निर्देशानुसार कार्य किया, लेकिन आयु के कारक कहे जाने वाले शनि ग्रह ने ठीक उसी समय अपनी स्थिति को परिवर्तित कर लिया जब मेघनाद जन्म लेने वाला था। इस वजह से वह यशस्वी, महान पराक्रमी, अविजित योद्धा तो बना लेकिन वह अल्पायु हो गया। रावण भगवान शिव का परम भक्त भी था और रावण ने ही शिव तांडव स्‍त्रोत की रचना की थी। लंकापति रावण का तांत्रिक मारण मंत्र जो बहुत ही प्रभावशाली होने के साथ बहुत सरल भी है। [उड्डीस तंत्र]

“लां लां लां लंकाधिपतये
लीं लीं लीं लंकेशं लूं लूं लूं लोल जिह्वां,
शीघ्रं आगच्छ आगच्छ चंद्रहास खङेन
मम अमुक शत्रुन विदारय विदारय मारय मारय
काटय काटय हूं फ़ट स्वाहा”

 

सावधान यह एक अति उग्र मंत्र है। कमजोर दिल वाले तथा बच्चे और महिलायें इस मंत्र को न करें। अपने गुरु से अनुमति लेकर ही इस साधना को करें। साधना काल में भयानक अनुभव हो सकते हैं। दक्षिण दिशा में देखते हुए दोनों हाथ ऊपर उठाकर जाप करना है।21 दिन तक 21000 मंत्र जाप रात्रि काल में करें। 2100 मंत्र से हवन करें। अगर विशेष शत्रु पर तांत्रिक मारण प्रयोग करना हो तो अमुक की जगह उस शत्रु का नाम लें। ध्यान रहे तांत्रिक मारण प्रयोग कर्मकांड करने वाले ब्राह्मणो, साधू ,संत, महात्मा , अन्य तांत्रिक बाबा एवं निर्दोष मनुष्यों पर न करें। अन्यथा कई गुना पटलकर आप पर आघात हो सकता है।  यह प्रयोग मात्र जानकारी के उद्देश्य से दिया गया है इसका दुरुपयोग न करें।


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